साथियों मैं "वैद्यराज छत्तीसगढ़" से इस विषय में जमीनी स्तर से वह सच्चाई बताना चाहूंगा देवगन गुरु और गुरु धनित्तर के बारे जिसे मैंने अपने दादा जी से सुना है, और हमारे छत्तीसगढ़ में जशपुर और सरगुजा में इन दोनों गुरुओं के पीढ़ी दर पीढ़ी ज्ञान को स़जोकर रखने वाले बहुत हैं, भले ही समस्त छत्तीसगढ़ प्रांत हो चाहे मध्यप्रदेश झारखंड ओड़िशा इन जगहों पर अलग अलग लोककथा प्रचलित है इन दोनों गुरुओं के बारे पर मेरा मानना है
कि जितने भी गुरु बने आदिवासी अंचल में उनके अलग अलग क्षेत्रों में कथा भी क्षेत्र के अनुसार है, और मैं इसलिए कह रहा हूं गुरु वो होते हैं जो एक स्थान से दुसरे स्थान जाकर कल्याण करते हैं और इसलिए हर क्षेत्रों में कथा भिन्न भिन्न सुनने को मिलती है , पर विस्तार से पढ़िएगा क्योंकि यह एक दुसरे से कैसे जुड़े और आखिरी क्या रहस्य है यह सुलझाने का प्रयास किया है मैंने
चलिए आज मै आपको बता रहा हूं इनके विषय में असली इतिहास
1. देवगन गुरु कौन थे ?
देखिए देवगन गुरु का असली मतलब था देव-गण अर्थात देवता के समान उसके गुणों वाला व्यक्ति, अगर सच कहूं तो देवगन गुरु का असली नाम कोई नहीं जानते होंगे लेकिन देवगन गुरु कहने पर सब लोग यह जान लेते हैं कि आदिवासी अंचल में सबसे चर्चित गुरु जिनका नाम हर वैद्य गुनिया बैगा और आम लोग भी लेते हैं
देखिए इसे अच्छे से जानना है तो सबसे पहले हर वो छोटी छोटी कड़ी को समझने का प्रयास करते हैं
2. आदिमानव काल से लेकर आने वाले समय में जड़ी बूटी और तांत्रिक ज्ञान प्राप्त हुआ
सबसे पहले तो यह बता दें कि छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश झारखंड ओड़िशा यह वो क्षेत्र है जहां आदिमानव काल के लाखों साल पहले के पुराने अवशेष मिले हैं, मतलब साफ है कि यहां एक मानव उत्पत्ति और विकास हुआ ,और जीवन में जड़ी बूटी और तंत्र मंत्र के विषय में आने वाले समय में चर्चा हुई होगी, भले ही मोहन-जोदड़ो, हड़प्पा सभ्यता जैसा विकसित नहीं हुआ हो पर यहां गुफा में रहकर आम जीवन जीते थे और समय आने पर वह छोटे छोटे घर द्वार बनाने लगे, और इसी कड़ी में आने वाले समय में एक घटना घटा तबसे प्रचलित लोककथा है क्योंकि उनके पास लिखित इतिहास ना हो पर मौखिक रूप से याद है पीढ़ी दर पीढ़ी
3. लोककथा में 12 असुर के बच्चों को बचाने का जिक्र मिलता है और वहीं से देवगन गुरु का नाम प्रचलित है
देखिए मेरे दादा जी से मैंने यह कथा सुना है
प्राचीन काल में जंगलों के बीच छोटा सा इंसानों का बस्ती था वहां अलग अलग प्रकार के लोग थे या हम यह कह सकते हैं अलग समुदाय के लोग थे, तो वहां सेमल का बड़ा सा वृक्ष था , वहां (राई और जट्टा गिद्ध) विशालकाय गिद्ध आये और वहां उस पेड़ पर घोंसला बनाने लगे, पर वह गिद्ध गांव के विकसित होने वाले हल चलाने वाले चीज जो कि जुआ और नागर (खेत जोतने के लिए बैल के लिए हल चलाने वाला लकड़ी से बना यंत्र) उनको उठाकर ले गए और वहां जो भी लकड़ी जैसा चीज था सबको सेमल वृक्ष में ले जाकर घोंसला बनाने लगे, और यह सब गांव वाले देखकर हैरान होने लगे और डरने भी लगे,
उसके पश्चात कुछ दिनों बाद राई और जट्टा गिद्ध के अंडे सेवने के बाद नन्हे गिद्ध के बच्चे जन्म लिए, और इन्हें नन्हे मुन्ने गिद्ध नहीं कह सकते हैं क्योंकि वो इतने बड़े विशाल गिद्ध थे तो उनके बच्चे कितने बड़े होंगे सोचिए !
और जैसे तैसे बच्चे बड़े होते जा रहे थे राई गिद्ध और जट्टा गिद्ध उनके लिए जंगली जानवर या कोई भी मांसाहारी भोजन ला देते थे क्योंकि गिद्ध मांसाहारी होते हैं
और एक दिन उसी बड़े सेमल वृक्ष से उन गिद्धों की नजर 12 असुर जनजाति के परिवार के बच्चे के उपर पड़ी और उसे सुबह का भोजन की व्यवस्था के लिए शाम के समय में ले गये क्योंकि वो सुबह भोजन की तलाश में जाते तबतक छोटे गिद्ध भुख से परेशान होते थे
और जैसे उस बच्चे को गिद्धों ने पंजों में जकड़कर विशाल सेमल वृक्ष के घोंसले में ले गये तब वहां के लोग बहुत दुखी होने लगे और रोने लगे चिल्लाने लगे हमारे बच्चे को बचा लो, पर किसकी हिम्मत होती की बचाने के जगह खुद गिद्धों का भोजन बन जाने का डर था
उसी जंगल में एक गुरु धुनी रमाकर बैठा था और उनकी चींखें उनतक पहुंची और वो आये और यह घटना उन्होंने सुना , और तब वह लोहार के पास गये , चुंकि प्राचीन काल से विकसित होता समय तक में अगरिया समुदाय को लोहे बनाने का ज्ञान हो चुका था और वह औजार बनाते थे दैनिक दिनचर्या में जो काम आता था जैसे कुल्हाड़ी,हल के लिए नागर, हथौड़ा सब
और जब अगरिया लोहार के पास गये तब उनसे 12 कोरी लंबा कील बनवाया (अर्थात 240 कील , 1 कोरी 20 को कहते थे) वो बनवाये और एक बड़ा सा कुल्हाड़ी
और भोर होने से पहले सेमल वृक्ष में लंबा कील ठोक ठोक कर चढ़ने लगे और तब आखिर में उपर चढ़ गए,
और सुबह सुरज उगते ही गिद्ध भोजन की तालाश में निकल पड़े, अपने छोटे गिद्ध बच्चों को छोड़कर, और वह जैसे ही सुबह का भोजन हमारे पास है सोचकर उस इंसानी बच्चे पर झपटने लगे बच्चा खुद को बचाने लगा रोने लगा, और उसके शरीर पर चोट खरोंच लग चुका था तब वह गुरु कुल्हाड़ी लेकर इंसानी बच्चे को बचाने का प्रयास करने लगे,
इस बीच गिद्धों ने भी उन्हें नोचने का पंजा मारने का प्रयास किया और अंत में गुरु ने कुल्हाड़ी से काट काट कर गिद्ध के बच्चों को टुकड़े टुकड़े करके धरती पर फेंक दिया, और बच्चे को जैसे तैसे करके बचाकर उन असुर जनजाति को सौंप दिया , और तब उन्होंने नाम बताया तब उन्होंने अपना नाम बताया "देवगन गुरु"
नोट - देखिए भले ही यह बात काल्पनिक लगे पर बहुत साल पहले तक में बड़े बड़े विशाल जीव जंतु हुआ करते थे और अपने से छोटे जिसका वो शिकार कर सकते थे वो करते थे, चाहे शेर बाघ तेंदुआ भेड़िया गिद्ध अजगर जो भी हो जंगलों में रहने वाले सदैव संकट से जूझते थे
और यही बात इस घटना की तो इसमें कितनी सच्चाई है यह जानने के लिए हमें अगली कड़ी में जाना होगा
4. गिद्धों के टुकड़े बने भुत प्रेत ? जिन्हें देवगन गुरु ने काटकर फेंका था
जब राई और जट्टा गिद्ध के बच्चों को देवगन गुरु ने इंसानी बच्चे को बचाने के लिए उन गिद्धों को टुकड़े टुकड़े करके धरती पर फेंक दिया तब वो भुत प्रेत बने
जैसे तालाब पोखर में गिरा उसे दरहा भूत,महुआ पेड़ में गिरा वो मशान,सिर कट के गिरा तो मुड़खोरी, आंख को फोड़ दिए और भौं सहित धरती पर फेंके वो चंडी चुरैल, खून गिरा वो रक्त मौली,पंख कटा डायन बना,बंजर भूमि पर गिरा वो मरी मशान, ऐसे ना जाने कितने भूत प्रेत जन्म लिए हैं और इसलिए छत्तीसगढ़ में प्राचीन भूत-प्रेत की संख्या 12 कोरी कहा गया है अर्थात 240 (जितने कील सेमल वृक्ष में ठोके थे गुरु)
इस बात की जानकारी जब देवगन गुरु को हुआ की वो कोई आम गिद्ध नहीं थे बल्कि मायारुपी काल थे , तब फिर उन्होंने धुनी रमाकर तांत्रिक मंत्र से इन सब भुतों को बांध दिए,
आज बैगा गुनिया चाहे कोई भी हो जहां डायन विद्या भूत-प्रेत जैसी समस्या आती है तब देवगन गुरु का नाम लेकर झाड़ फूंक करते हैं और फिर तुरंत शांत पड़ जाता है सब
नोट - यह एक काल चक्र है जिसका अंत संभव नहीं है काल सदैव पीछा करता ही है, और इसके बंधे नियम उस समय काम नहीं करते जब आप अपने कदम लांघकर उस जगह जाते हो जहां जाना मना है, जैसे कि इन सभी भुत प्रेत का स्थान है वैसे ही उनके जगह पर आप जाओगे तो कुछ नकारात्मक प्रभाव पड़ने लगता है, यह स्थान जंगल झाड़ का होता है,
वहीं लोक मान्यता की बात करें तो आप स्वयं कई जगह देख पायेंगे अगर आप जंगलों के रास्ते गुजरें, जिसमें जलती हुई आग की लपटें दिखाई देना या कुछ असहज महसूस करना जैसे कोई चीज जकड़ा हो , यह सब उन्ही सब प्रेतों का प्रभाव है , शाम रात को सुनसान इलाके में नहीं जाना चाहिए खासकर छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश ओड़िशा झारखंड के पुराने इलाकों में
देवगन गुरु के मंत्र ऐसे हैं जो बहुत प्रभावशाली होते हैं, 64 जोगिनी को भी बांध दे ऐसे गुरु हैं जिनका नाम लेने से और उनके आह्वान मंत्र और 12 असुर लीला के बारे में मंत्र द्वारा सुनते ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं,
छत्तीसगढ़ के सरगुजा और जशपुर में देवगन गुरु की ज्यादा मान्यता है क्योंकि यही वो क्षेत्र है जहां उत्तर दिशा के 64 जोगिनी विद्या को रोकने के लिए देवगन गुरु धुनी रमाए थे, और वही सरगुजा के लखनपुर विकासखंड अंतर्गत देवगढ़ नामक रेणु नदी के पास इनका जिक्र आता है जहां प्राचीन समय के कुछ तथ्य अवशेष मिले हैं , लोकमान्यता के अनुसार 64 योगिनी देवी बहुत उग्र होती हैं और प्राचीन समय में तो व्यक्ति लोगों के जीवन में उत्पात मचा देती थी, और इनको अपने वश में करने वाले देवगन गुरु हैं
नोट - देवगन गुरु के साधना में ही नाथ संप्रदाय सरगुजा के देवगढ़ आया होगा क्योंकि यह देवगन गुरु का वो क्षेत्र है जहां से उत्तर दिशा से चौंसठ (64 Yogini) 62 बीर (अग्र देवी के चेले वाहक) को रोकने का जिक्र मिलता है बा
नाथ संप्रदाय में 9 नाथ 84 सिद्ध हुए उनका भी देवगढ़ में रिकार्ड प्राप्त हुआ है जहां योगी साधु नाथ संप्रदाय के धुनी रमाकर बैठे थे
जिसमें नाथ संप्रदाय से माया मछिंन्द्रनाथ और गुरु गोरखनाथ प्रमुख हैं और सबसे ज्यादा प्रचलित भी हैं
4. छत्तीसगढ़ के गुरु धनित्तर कौन हैं ?
जैसा की आपको बता दूं छत्तीसगढ़ में गुरु धनित्तर का नाम बहुत प्रचलित है जिन्होंने महादेव की उपासना की और उनसे ही जड़ी बूटी का का ज्ञान मिला और वही ज्ञान आज लोक कल्याण के लिए प्रचलित है, गुरु धनित्तर का शाबर मंत्र है जो एकदम सरल शब्दों में मिलता है छत्तीसगढ़ी में, और इसके बारे में पुरी बात अगली कड़ी में जानेंगे
5. गुरु धनित्तर जड़ी बूटी प्रचार प्रसार ?
गुरु धनित्तर जड़ी बूटी सहित शाबर मंत्रों का ज्ञान अपने चेलों को देने लगे और सभी जानकारी दिए बिना उनकी मृत्यु हो गई, तब उनके शिष्यों ने सोचा कि गुरु तो इतने बड़े ज्ञानी थे और बिना पुरी ज्ञान दिए मृत्यु को प्राप्त कर लिए
तब किसी नकारात्मक विचार वाले शिष्य ने कहा अगर हम इनका मांस पकाकर खा लें तो हमें कितना ज्ञान होगा, तब उन्होंने गुरु धनित्तर का मांस पकाकर खाने के लिए तैयार हो गये, और उस से पहले वो नहाने गये और आने के बाद खाने के बारे में सोचे
यह घटना महादेव और गौरा देख रहे थे और माता गौरा ने महादेव से कहा कि जो मनुष्य लोक कल्याण के लिए विद्या सीख रहे थे वो आसुरी प्रवृत्ति के हो चुके हैं उन्होंने आप रोकिए नहीं तो अनंर्थ हो जायेगा , और तब महादेव ने भेष बदलकर उनको रोककर कहा यह गलत है ऐसा मत करो, और नदी में उस पके मांस के मटके को पानी में बहाने को बोले
नोट - जब मनुष्य लोक कल्याण के मार्ग पर चलता है तो वह किसी की जान लेने की या मांस मछली खाने की नहीं सोचता, और अगर ऐसा सोचना है तो वह आसुरी प्रवृत्ति वाला हो जाता है जिसके मन में दया प्रेम करुणा के लिए जगह ना हो वो लोगों के भले के लिए क्या सोचेगा, हमारा मन ही हमें दैव विचार और राक्षसी प्रवृत्ति का बनाता है, और यही सत्य है
6. गुरु धनित्तर के मांस को खाया स्त्रीयों ने और बनी छत्तीसगढ़ की टोनही डायन
देखिए धनित्तर गुरु के चेलों ने जिस पके हुए मांस के मटके को नदी में बहाया था उसे नदी में नहाने आये महिलाओं ने खा लिया
जिस नदी पर वो मटका बहाया गया था वो काफी दूर एक गांव से गुजरते हुए नदी के पास पहुंच गया और वहां पर कुछ महिलाएं नहा रही थी और तब उन्होंने मटके को देखा और उसे खोलकर वो मांस को खाने लगे और बचे हुए को फिर नदी में बहा दिए
और उसी दिन से छत्तीसगढ़ के कुछ जाति (नाम नहीं लूंगा जाति का) महिलाओं को टोनही डायन विद्या का खुझ से ज्ञान होने लगा और टोना टोटका तंत्र मंत्र में माहिर हो गये
और यही नहीं बल्कि जो चेले गुरु धनित्तर का मांस पकाए थे वो भी तंत्र मंत्र टोनहा विद्या सीख गये
आपको एक विशेष चीज बताना चाहूंगा भले ही आप लोग बैगा गुनिया आदिवासी अंचल के कुछ लोगों को चाहे कोई भी अन्य जाति का हो उनके तांत्रिक ज्ञान को आप लोग सही समझ लेते होगे पर कुछ लोग खुद टोनही डायन के साथ मिलकर जादू टोना करते हैं, एक डायन जादू करेगी वहीं वो बैगा झाड़ फूंक करेगा और ठीक कर देगा , इनका मार्केट चलता रहता है
अगर वही निस्वार्थ भाव से कल्याण करने वाले बैगा गुनिया की बात करें तो वो भी बहुत सारे लोग हैं पर उन्हें मृत्यु जैसे घटना का सामना करना पड़ जाता है !
7. असम बंगाल का जादू है छत्तीसगढ़ की देन ?
जी हां यह सच्चाई है और उस पके हुए मांस को छत्तीसगढ़ की महिला लोगों ने आगे बहा दिया था वो बंगाल प्रांत पहुंच गया और वहां भी ऐसी विद्या सीखे
अगर मेरे हिसाब से कहूं तो यह नदी छत्तीसगढ़ की प्रमुख नदी मांड नदी है जो छत्तीसगढ़ ओड़िशा से बंगाल की खाड़ी में जाकर गिरता है और मांस का मटका भले ही वहां ना पहुंच पाया हो पर उलट पलट होकर मांस पानी में मिल गया होगा और जीव जंतु इंसान के माध्यम से वहां तक जरूर गया होगा
नोट - तिरिया राज असम चाहे बंगाल क्षेत्र की बात करें तो वहां सिर्फ जादू होता है, पर छत्तीसगढ़ में काला जादू होता है, और छत्तीसगढ़ के डायन विद्या में व्यक्ति झट से मर जाता है और कुछ समय बाद मृत्यु हो ऐसा भी करते हैं
भले ही सुनने में अजीब लगे या अंधविश्वास लगे पर सच्चे घटना का जिक्र करना चाहुंगा सन् 2004 की बात है बांसाटिकरा कुनकुरी गांव जशपुर जिले में स्थित है जहां हरेली से पहले मतलब की सावन के कृष्ण पक्ष अंधेरी अमावस्या की रात को ठाकुरपोढ़ी बालकपोढ़ी और बांसाटिकरा के बहुत सारे महिलाओं की मंडली उस छोटे से जंगल में बिना वस्त्र धारण किए दिया जलाकर बलि चढ़ाकर पुजा पाठ करते हुए पकड़े गए जोकि टोनही डायन विद्या सीख रहे थे, पर यह सुबह हिम्मत करके गये गांव वाले और पुलिस प्रशासन तब उन्होंने उन्हें रंगे हाथों पकड़ा और गांव वाले लोकलाज के भावना से पुलिस प्रशासन को वापस भेज दिए, और छत्तीसगढ़ में 2005 में टोनही डायन प्रताड़ना जैसे मुद्दों को रोकने के लिए एक कानून लागू हुआ, वरना बहुत सारे लोगों को मारते पीठते भी थे लोग
अब आप सोचिए अगर ऐसी कोई चीज नहीं होती तो ये रात को दुनिया भर का पुजा पाठ कैसे करते पकड़े जाते हैं ?
8. जड़ी बूटी और तांत्रिक प्रयोग को एक साथ रोकने के लिए लिया जाता है देवगन गुरु और गुरु धनित्तर का नाम
जैसे कि मैंने पहले ही बता दिया था कि ये दोनों काफी प्रबल शक्ति के जानकार थे जिसमें नागमत विद्या जिसमें गुरु धनित्तर का जिक्र आता है सर्प काटने पर भी व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती छत्तीसगढ़ के कई जगह जागृत गुरु शक्ति है
वहीं बात करें देवगन गुरु की तो देवगन गुरु के नाम से भुत प्रेत जादू टोना टोटका तंत्र मंत्र सब ठीक हो जाता है इसलिए इनको याद किया जाता है
भादो मास के शुक्ल पक्ष 5 को ऋषि पंचमी मनाया जाता है जिसमें देवगन गुरु और गुरु धनित्तर का विशेष रूप से पुजा पाठ होता है छत्तीसगढ़ प्रांत में
नोट - आज के समय में व्यक्ति बीमार पड़े तो सबसे पहले डाॅक्टर के पास जाये क्योंकि पुर्ण विद्या और ज्ञान सभी वैद्य बैगा आयुर्वेद के आयुर्वेदाचार्यों के पास नहीं होता की सब जगह लोगों की जान बचा सकें, भले ही वहां से थक गए तो वापस अपने प्राचीनतम आयुर्वेद के ज्ञान समेत तांत्रिक प्रयोग का उपाय निकाले
9. गुरु धनित्तर और देवगन गुरु के रहस्य
देखिए सबसे पहले तो आपको बता दूं कि इन दोनों कि विद्या वर्तमान में थोड़ा बहुत सुनने को मिल जाता है बैगा गुनिया द्वारा, पर पहले बहुत सख्त होते थे गुरु आस्था के प्रति उन्हें ही ज्ञान मिलता था, सन् 1932 में पुर्ण रुप से छत्तीसगढ़ में सभी जगह स्कूल खुला, पर मेरे दादा जी सन् 1907 के थे तब उनकी शिक्षा किसी पेड़ के नीचे या जंगली क्षेत्रों में समतल मैदानी जगह पर होता था
जिसमें शिक्षा के साथ गुरु धनित्तर जड़ी बूटी और देवगन गुरु विद्या सिखाया जाता था और साथ ही आधुनिक तकनीक शिक्षा जिसके लिए वाराणसी उत्तरप्रदेश से शिक्षक आते थे और बदले में चावल दाल या कौड़ी लिया करते थे,
और तब सच्ची लगन वालों को ही सब चीजों का ज्ञान मिलता था, साथ ही अंग्रेजों के हुकुमत से लड़ने के लिए ट्रेनिंग दी जाती थी और इसी वजह से पहले के लोगों को असीम ज्ञान प्राप्त था
मेरे दादा जी का कहना था कि जड़ी बूटी विद्या और तांत्रिक विद्या के लिए साधना (धुनी रमाना) पड़ता है फिर जड़ी बूटी का ज्ञान प्राप्त होता है, और इसका जिक्र किसी से नहीं करना होता है क्योंकि यह अंतर्ज्ञान कि बात होता है
मैंने बार बार अपने यूट्यूब चैनल कि विडियो में भी कहा है कि यह ऋषि मुनि लोगों का ऋग्वेद यजुर्वेद नहीं है जो 5000 हजार साल पुराना हो, बल्कि प्राचीन काल का ज्ञान है जिसकी गणना नहीं किया जा सकता
10. तीन प्रकार के औषधि होते हैं बैगा आयुर्वेद में ?
१• इस औषधि विद्या में आधे से ज्यादा ऋषि आयुर्वेद जैसे ही जड़ी बूटी को दिया जाता है बैगा आयुर्वेद में जो आधा बैगा आयुर्वेद का मिश्रण रहता है और यह लंबे समय आने पर शरीर को ठीक करता है
२• इस औषधि विद्या में लगभग सभी क्षेत्रों के बैगा गुनिया वैद्य जोकी जंगली जड़ी बूटी बैगा आयुर्वेद की जड़ी बूटी होता है वो इसका प्रयोग करते हैं जो बहुत जल्दी प्रभाव डालता है शरीर पर
३• भुंईफोड़ बैगा आयुर्वेद विद्या को स्वयं सिद्ध गुरु विद्या कहते हैं, ऐसे लोग जो दुसरों के हित के लिए सोचते हैं, उन्हें परमात्मा किसी भी कार्य को सौंप देता है जो उस कार्य में निपुण हो, पर भुंईफोड़ जड़ी बूटी और तांत्रिक विद्या कठोर नियम पर ही मिलता है, इसमें खुद से सपने आते हैं जिसमें घटित घटनाओं से जुड़े समस्या का समाधान बताते हुए सपने देखने को मिलता है, जड़ी बूटी और तांत्रिक विद्या मिलता है जिसका प्रयोग करते हैं लोग
नोट - सब भुंईफोड़ बैगा आयुर्वेद में अलग अलग स्थान पर रहने वाले बैगा गुनिया चाहे परमात्मा द्वारा चुने गए औषधि का ज्ञान प्राप्त होता है, पर इसमें एक ही बीमारी के औषधि हजारों प्रकार के होते हैं, जैसे 10 बैद्य को 10 अलग अलग फार्मुला मिलता है, जो सिर्फ 24 घंटे या 72 घंटे में असर दिखा देता है
जड़ी बूटी को खोदकर लाने के बाद देवगन गुरु और गुरु धनित्तर के नाम से अगरबत्ती धुप जलाकर प्रार्थना करना पड़ता है और तब जाकर जड़ी बूटी काम करता है अन्यथा नहीं
11. महादेव गौरा का जिक्र किया था उसे स्पष्ट करना चाहुंगा
देखिए आज के समय में धार्मिक मान्यता के साथ मतभेद भी बहुत ज्यादा है जिसमें हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आदिवासी प्रकृति पुजा वगैरह वगैरह
• पर मैं बता दूं, कि महादेव को लोग भले ही अलग अलग प्रकार से पुजें पर नाथ संप्रदाय में भी भोलेनाथ कहा गया जिसको आदिगुरु कहते हैं 9 नाथ गुरु गोरखनाथ के चेले बने, उसमें भी महादेव को मानते हैं
• वहीं गुरु धनित्तर के भी विषय में अगर जिक्र करते तो एक बात समझ में आता है की जड़ी बूटी के ज्ञाता महादेव ही है इसलिए छत्तीसगढ़ में आदिवासी अंचल में जड़ी बूटी को पीसकर तैयार करने के बाद धरती पर महादेव और गौरा पार्वती के नाम से तर्पण किया जाता है
• देवगन गुरु के विषय में भी तांत्रिक प्रयोग में अंत में कोई भी मंत्र हो पर आखरी में "महादेव पार्वती की आन" इस शब्द का प्रयोग किया जाता है, मतलब साफ है महादेव पार्वती सबसे बड़े बैगा बैगिन हैं
• ग्राम आदिवासी अंचल में भी बहुत सारे स्थानीय देवी देवता को बुलाकर सवारी चढ़ाया जाता है तब महादेव जिसको चढ़ता है उसकी हरकतें कुछ इस प्रकार रहता है जैसे हाथ में सबसे पहले चावल पकड़ लेगा और अपने उपर पानी डालने बोलते हुए देखा जाता है और फिर हल्दी पानी से अभिषेक होता है, फिर सब जगह दिपक जलवाते हैं और सभी देवता की सवारी चाहे भुत प्रेत की सवारी हो उनके नीचे सब साथ आ जाते हैं, और महादेव की सवारी जिसपर रहता है वो चावल फेंकता है सब पर
• लगातार आकस्मिक घटनाओं में मृत्यु होने पर मुझे बुलाया जाता है और तब मैं भी काल को शांत करने के लिए पुजा करने जाता हूं और सब शांत पड़ जाता है !
इस बात से साफ जाहिर है कि महादेव ही सबसे बड़े गुरु (बैगा) पार्वती ही (बैगिन) है और इन्हीं के सामने काल दफन हो जाता है, इनसे बड़ा कोई नहीं है
(छत्तीसगढ़ में कहते हैं "महादेव जैसा कोई बैगा नहीं, और पार्वती जैसी कोई टोनही नहीं")
इसका मतलब यह है कि यह संसार में जो भी लीला होता आया है उसके साक्षी स्वंय महादेव पार्वती हैं
महादेव जहां खड़े हो गए उस से आगे कोई बढ़ नहीं सकता, वहीं पार्वती मां जैसा तांत्रिक मायावी प्रयोग कर महादेव को पाना यह दर्शाता है कि वो जादू टोना (सम्मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन, विद्वेषण, मारण) इन षष्ठकर्म की देवी हैं
छत्तीसगढ़ में मान्यता है कि टोनही डायन विद्या में भी महाकाली समेत पार्वती (गौरा) की पुजा करके षष्ठ कर्म के विद्या को जानने लगते हैं 64 योगिनी देवी भी इन्हीं के अधीन हैं
छत्तीसगढ़ में समस्त बैगा गुनिया महादेव को स्मरण करते हैं और पुजा पाठ जड़ी बूटी देकर कर सब ठीक करते हैं !
परमात्मा को किसने देखा है? इसलिए मानव कल्याण के लिए मनुष्य लोग ही अपने ध्यान साधना से गुरु बनते हैं और देवगन गुरु और गुरु धनित्तर जैसे विद्या प्राप्त करने के बाद लोक कल्याण के लिए और भी चेले बनाते हैं जिनके कुछ नाम हैं - (बिझम गुरु, लालन गुरु, बालम गुरु, बिझन गुरु, ओझा गुरु, आग गुरु, झाम गुरु, बिरसा गुरु, संभु गुरु, लिंगो गुरु, चैला गुरु, माधोंमंत्री, भाफुंर गुरु,करुवा गुरु, आलन गुरु, बालन गुरु)
ये बड़े सिद्ध गुरु छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश ओड़िशा झारखंड के अलग अलग हिस्सों में बंटे,
छोटे चेले - ( धानू पंडा, कमला पंडा, मननोधन पंडा, हीरा पंडा, जगत पंडा, भूरा पंडा, पोपो पंडा, माडा पंडा , पुरार पंडा, चेनी पंडा )
इन सब पंडों नें झारखंड क्षेत्रों में देवगन गुरु का प्रचार प्रसार किया और ज्ञान दिए,
मैं जो भी जानकारी दिया हूं उसे मेरे दादा जी से सुना था देवगन गुरु और गुरु धनित्तर के अलग अलग स्थान पर अलग अलग लीला हो सकता है इसलिए सिर्फ एक ही आर्टिकल में पुरी कहानी पता नहीं चलेगा आपको, पर जो जानकारी दिया वो मेरे हिसाब से काफी है आप सबके लिए , समस्त शक्ति आप सबका कल्याण करे.
जय देवगन गुरु
जय गुरु धनित्तर
जय बूढ़ादेव
जय महादेव पार्वती
धन्यवाद !
(वैद्यराज)
छत्तीसगढ़ जड़ी बूटी
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Jadi buti





